मुनीश बाबू और माला-साफा का मौसम!
पहले जी-हुजूरी, अब “दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे” — पालिका में दोस्ती का नया अध्याय
पालिका के गलियारों में इन दिनों एक चेहरा कुछ ज्यादा ही चमकता दिखाई दे रहा है।
चेहरे पर मुस्कान…
कंधे पर साफा…
गले में माला…
और चाल में ऐसी आत्मीयता, जैसे पालिका की फाइलें भी कह रही हों—
“आइए मुनीश बाबू, आपका ही इंतजार था!”
पालिका के पुराने चपरासी ने यह नजारा देखा तो मुस्कुराते हुए बोला—
“साहब, हमारे मुनीश बाबू आजकल माला-साफा पहनने का खूब आनंद ले रहे हैं!”
मैंने पूछा—
“कहीं कोई बड़ा काम कर दिया क्या?”
चपरासी—
“नहीं साहब।”
“कोई बड़ा पद मिल गया?”
“नहीं साहब।”
“कोई नेता-वेता बन गए?”
चपरासी हंस पड़ा—
“अरे नहीं-नहीं साहब… ऐसा भी कुछ नहीं है!”
मैंने पूछा—
“फिर यह माला-साफा का मौसम कैसे आया?”
चपरासी ने चारों तरफ देखा, फिर मुस्कुराकर बोला—
“साहब, मुनीश बाबू के अजीज मित्र ने निकाय चुनाव जीत लिया है… अब पालिका की कमान उनके हाथ में है!”
इतना कहकर चपरासी ने आंख दबाई और बोला—
“अब तो मुनीश बाबू की पांचों उंगलियां घी में हैं!”
मैंने कहा—
“लेकिन इसमें मुनीश बाबू की उपलब्धि क्या है?”
चपरासी बोला—
“उपलब्धि? साहब, दोस्ती निभाना भी आजकल छोटी उपलब्धि थोड़े ही है!”
फिर थोड़ा करीब आकर बोला—
“पहले मुनीश बाबू पालिका में आते थे तो जी-हुजूरी वाला अंदाज दिखाई देता था। अब वही मुनीश बाबू आते हैं तो माहौल कुछ ऐसा लगता है जैसे कोई अपना ही घर हो।”
मैंने पूछा—
“मतलब?”
चपरासी मुस्कुराया—
“पहले साहबों को सलाम था… अब दोस्ती को सलाम है!”
बस फिर क्या था।
मुझे तो मुनीश बाबू को देखते ही ‘शोले’ फिल्म याद आ गई।
बस फर्क इतना है कि फिल्म में दोस्ती का संवाद था—
“ये दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे…”
और यहां लगता है—
“ये दोस्ती हम नहीं छोड़ेंगे!”
पालिका चपरासी ने तुरंत बात पकड़ ली—
“साहब, अब तो दोस्ती ऐसी है कि जहां मुनीश बाबू, वहां मुस्कान… जहां मुस्कान, वहां माला… और जहां माला, वहां साफा!”
मैंने कहा—
“तो क्या अब पालिका में काम भी दोस्ती से चलेगा?”
चपरासी ने तुरंत हाथ जोड़ लिए—
“साहब, इतना बड़ा सवाल मत पूछिए… मैं तो चपरासी हूं, फाइल नहीं!”
चाय वाला बीच में कूद पड़ा—
“अरे भाई, राजनीति में दोस्ती पुरानी हो तो तस्वीर नई बन जाती है!”
बुजुर्ग ने पूछा—
“कैसे?”
चाय वाला बोला—
“पहले आदमी पीछे खड़ा रहता है, फिर बगल में खड़ा होता है, फिर मंच पर साथ बैठता है… और देखते-देखते माला-साफा भी साथ आ जाता है!”
चपरासी बोला—
“और अगर दोस्त सत्ता में हो तो?”
चाय वाला मुस्कुराया—
“फिर भाई साहब, माला सिर्फ गले में नहीं आती… पहचान पर भी आ जाती है!”
थड़ी पर ठहाका गूंज उठा।
चपरासी ने फिर धीरे से कहा—
“साहब, पहले मुनीश बाबू को देखकर लगता था कि ये पालिका के चक्कर लगा रहे हैं… अब लगता है पालिका ही इनके चक्कर में घूम रही है!”
मैंने कहा—
“लेकिन ऐसा कहना ठीक होगा?”
चपरासी हंसते हुए बोला—
“साहब, मैंने तो बस चाय की दुकान वाली बात कही है… सच-झूठ का हिसाब तो फाइलें जानें!”
बुजुर्ग ने गंभीर होकर कहा—
“दोस्ती होना कोई गलत बात नहीं। मित्र चुनाव जीत जाए तो खुशी होना भी स्वाभाविक है। सवाल सिर्फ इतना है कि दोस्ती और प्रशासनिक कामकाज की सीमा साफ रहनी चाहिए।”
चाय वाला बोला—
“यानी दोस्ती अपनी जगह और पालिका अपनी जगह?”
बुजुर्ग—
“बिल्कुल।”
चपरासी ने तुरंत कहा—
“लेकिन साहब, यह बात मुनीश बाबू को कौन समझाए? वह तो इन दिनों शायद ‘दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे’ के रिहर्सल में व्यस्त हैं!”
फिर उसने मुस्कुराते हुए कहा—
“पहले मुनीश बाबू जी-हुजूरी करते थे… अब लगता है जी-हुजूरी का जमाना गया, दोस्ती का जमाना आया!”
चाय वाला बोला—
“और माला-साफा?”
चपरासी—
“वह तो दोस्ती का ड्रेस कोड है साहब!”
फिर दुकान पर हंसी छूट गई।
मैंने पूछा—
“और नारदमुनि की संतानों का क्या?”
चपरासी ने चाय का गिलास उठाया और बोला—
“साहब, जहां माला-साफा हो, जहां दोस्ती हो, जहां पालिका की राजनीति हो… वहां नारदमुनि की संतानों की खबर कैसे नहीं पहुंचेगी!”
चाय वाला बोला—
“उनका काम ही तो है—कहां कौन किसके करीब है, कौन किसके साथ है और किसकी माला किसके गले में गई… सबकी खबर रखना!”
बुजुर्ग ने मुस्कुराकर कहा—
“नारायण… नारायण! दोस्ती पुरानी हो तो राजनीति में नई चमक आ ही जाती है।”
और चपरासी जाते-जाते बोल गया—
“साहब, अब मुनीश बाबू को देखकर मुझे एक ही गाना याद आता है—
‘ये दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे…’
क्योंकि दोस्ती अगर सत्ता की चौखट तक पहुंच जाए तो माला-साफा भी खुद रास्ता पूछकर पहुंच जाता है!”
कहानी जारी है…
अभी तो माला-साफा का मौसम शुरू हुआ है, आगे देखना है दोस्ती का यह सिलसिला पालिका के गलियारों में कितनी दूर तक जाता है।
पिक्चर अभी बाकी है मेरे दोस्त….


