वार्ड की सरहदें और लोकतंत्र का हास्य
संपादकीय : गोपाल नायक, संपादक — सच इंडिया नेटवर्क
चुनाव आते ही लोकतंत्र का एक बड़ा दिलचस्प रूप देखने को मिलता है। वही शहर, वही सड़कें, वही बाजार, वही लोग और वही रिश्ते… लेकिन अचानक सबसे बड़ा सवाल बन जाता है—“आप किस वार्ड के हैं?”
कल तक जो व्यक्ति पूरे शहर का अपना था, चुनाव आते ही पता चलता है कि वह तो दूसरे वार्ड का निकला!
यह लोकतंत्र की कोई खामी नहीं, बल्कि चुनावी माहौल की एक ऐसी विडंबना है, जो कभी मुस्कुराने पर मजबूर करती है और कभी सोचने पर।
दरअसल, वार्ड की सीमाएं प्रशासनिक व्यवस्था का हिस्सा हैं। मतदाता किस वार्ड में मतदान करेगा, कौन प्रत्याशी किस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करेगा—यह सब स्पष्ट होना लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए आवश्यक है। लेकिन जब यही सीमा सामाजिक पहचान का पैमाना बनने लगे, तब सवाल जरूर खड़ा होता है।
क्या ईमानदारी का भी कोई वार्ड होता है?
क्या योग्यता की भी कोई सीमा रेखा होती है?
क्या जनसेवा वार्ड नंबर देखकर शुरू और समाप्त होती है?
शायद नहीं।
चुनाव के दौरान प्रत्याशी अपने क्षेत्र के हर मतदाता तक पहुंचने की कोशिश करता है। कभी किसी गली में दस्तक देता है, कभी किसी बुजुर्ग का आशीर्वाद लेता है, कभी किसी परिवार से संवाद करता है। इस पूरी प्रक्रिया में यदि कभी यह पता चल जाए कि सामने वाला व्यक्ति उस वार्ड का मतदाता ही नहीं है, तो घटना भले ही हास्य पैदा करे, लेकिन संदेश बड़ा साफ है—चुनाव में जोश के साथ भूगोल का ज्ञान भी जरूरी है।
आखिर मतदाता सूची और वार्ड की सीमाओं को समझे बिना चुनावी रणनीति कुछ वैसी ही हो सकती है जैसे बिना नक्शे के यात्रा पर निकल जाना।
लेकिन इस हास्य के पीछे एक गंभीर सवाल भी है।
क्या हम अपने ही शहर के लोगों को केवल वार्ड नंबर के आधार पर ‘अपना’ और ‘बाहरी’ मानने लगे हैं?
एक ही शहर के लोग वर्षों से साथ रहते हैं। बाजार साझा है, स्कूल साझा हैं, सामाजिक समारोह साझा हैं, सुख-दुख साझा हैं। लेकिन चुनाव आते ही वही शहर कई छोटी-छोटी राजनीतिक सीमाओं में बंट जाता है।
“वह हमारे वार्ड का नहीं है।”
यह वाक्य चुनावी गणित में भले ही महत्वपूर्ण हो, लेकिन सामाजिक जीवन में इसका अर्थ बहुत छोटा होना चाहिए।
मतदाता के लिए असली सवाल यह होना चाहिए कि उम्मीदवार योग्य है या नहीं, ईमानदार है या नहीं, जनता की समस्याओं को समझता है या नहीं और निर्वाचित होने के बाद अपने दायित्व के प्रति जवाबदेह रहेगा या नहीं।
किसी प्रत्याशी का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि वह किस गली में रहता है। इसी तरह किसी प्रत्याशी को केवल व्यक्तिगत पहचान या नजदीकी के कारण समर्थन देना भी लोकतांत्रिक विवेक नहीं कहा जा सकता।
चुनाव विचारों और प्राथमिकताओं का अवसर होना चाहिए, व्यक्तिगत कटुता का नहीं।
आचार संहिता का उद्देश्य भी चुनाव को मर्यादित, निष्पक्ष और शांतिपूर्ण वातावरण में संपन्न कराना है। इसलिए राजनीतिक प्रतिस्पर्धा हो, लेकिन भाषा में संयम रहे। मतभेद हों, लेकिन मनभेद न हों। प्रचार हो, लेकिन किसी व्यक्ति या समुदाय को नीचा दिखाने की कोशिश न हो।
क्योंकि चुनाव कुछ दिनों का है, लेकिन समाज हमेशा के लिए है।
आज जिस व्यक्ति को हम ‘दूसरे वार्ड’ का कह रहे हैं, संभव है कल किसी सामाजिक कार्य में वही हमारे साथ खड़ा हो। आज जो सीमा चुनावी नक्शे पर महत्वपूर्ण है, कल वही सीमा हमारे रोजमर्रा के जीवन में शायद कोई मायने ही न रखे।
हमारी संस्कृति ने बहुत पहले कहा था—“वसुधैव कुटुम्बकम।”
आज जरूरत सिर्फ इतनी है कि उस विचार को कम से कम अपने शहर की सीमाओं के भीतर तो जीवित रखा जाए।
वार्ड की सीमा प्रशासन तय करे, मतदाता का विवेक नहीं।
वार्ड की पहचान चुनाव तय करे, रिश्ते नहीं।
और चुनावी प्रतिस्पर्धा हो, लेकिन सामाजिक दूरी नहीं।
क्योंकि अंततः सवाल यह नहीं होना चाहिए कि—
“कौन हमारे वार्ड का है?”
बल्कि सवाल यह होना चाहिए—
“कौन हमारे वार्ड के लिए बेहतर है?”
यही सोच लोकतंत्र को मजबूत करेगी।
और शायद उस दिन चुनावी भूगोल भी थोड़ा आसान हो जाएगा… क्योंकि फिर प्रत्याशी को हर दरवाजे पर पहुंचने से पहले सिर्फ इतना नहीं सोचना पड़ेगा कि “यह वार्ड कौन-सा है?”
बल्कि यह भी समझ आएगा कि “यहां के लोगों की जरूरत क्या है?”
यही लोकतंत्र की असली खूबसूरती है—
सरहदें नक्शे पर रहें, लेकिन सोच उससे कहीं बड़ी हो।
— गोपाल नायक
संपादक, सच इंडिया नेटवर्क


