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“मुनीश बाबू और पालिका की प्रेम कहानी”

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“मुनीश बाबू और पालिका की प्रेम कहानी”

“शहर में रहने के लिए मकान जरूरी है या पालिका में रोज हाजिरी?”
यह सवाल मेरे दिमाग में तब आया, जब मैंने पिछले पांच-छह साल से एक ऐसे किरदार को पालिका में नियमित देखा, जिसकी न तो कोई सरकारी कुर्सी थी, न कोई सरकारी पद… मगर हाजिरी ऐसी कि मानो पालिका का बायोमेट्रिक इन्हीं के नाम से शुरू होता हो!
कहानी बिल्कुल फिल्मी है।
सुबह का वक्त… शहर अभी अंगड़ाई ले रहा है… चाय की दुकानों पर पहला उबाल आ रहा है… और उधर मुनीश बाबू सफेद शर्ट, काली पेंट, चमचमाते जूते, आंखों पर चश्मा और इत्र की खुशबू के साथ निकल पड़ते हैं।
ऐसा लगता है जैसे घर से नहीं, पालिका की शूटिंग पर जा रहे हों और आज का रोल ‘बाबू साहब’ का हो।
मैंने भी सोचा—आखिर मामला क्या है?
फिर शुरू हुई मेरी खोज…
एक दिन मैंने पालिका के एक पुराने चपरासी को पकड़ लिया।
मैंने पूछा—
“भाई, ये मुनीश बाबू कौन हैं?”
चपरासी ने पहले मुझे ऊपर से नीचे तक देखा। फिर बोला—
“साहब, आप शहर के होकर भी मुनीश बाबू को नहीं जानते?”
मैंने कहा—“नहीं।”
उसने माथे पर हाथ मारा—
“फिर तो साहब, आप इस शहर में रहते जरूर हैं… लेकिन शहर को जानते नहीं!”
इसके बाद उसने जो कहानी सुनाई, वह किसी फिल्म की पटकथा से कम नहीं थी…

कहानी सुनकर मैं चुपचाप पालिका से बाहर निकल आया।
दिमाग में एक ही सवाल घूम रहा था—
आखिर मुनीश बाबू पालिका में रोज क्यों आते हैं?
नौकरी नहीं…
पद नहीं…
कुर्सी नहीं…
फिर भी हाजिरी पूरी!
तभी पीछे से चपरासी की आवाज आई—
“साहब… कल फिर आइएगा!”
मैंने पूछा—“क्यों?”
वह बोला—
“कल मुनीश बाबू की नई कहानी सुनाऊंगा… आज तो सिर्फ ट्रेलर था!”
मैंने पीछे मुड़कर पालिका की तरफ देखा और मन ही मन कहा—
“लगता है इस फिल्म का इंटरवल तो हो गया… लेकिन पिक्चर अभी बाकी है!”
और यकीन मानिए, उस दिन से मुझे समझ आ गया—
शहर में रहने के लिए मकान जरूरी हो सकता है…
लेकिन पालिका में रोज हाजिरी लगाने के लिए शायद कुछ और ही जरूरी है!
—बाकी कहानी अगली कड़ी में… क्योंकि मुनीश बाबू की पालिका वाली फिल्म अभी जारी है……

मुनीश बाबू की पालिका वाली फिल्म — अगली कड़ी

“पिछली कड़ी में आपने देखा… बाबू की नौकरी नहीं, फिर भी हाजिरी फुल!”

पिछली कड़ी में सवाल था—मुनीश बाबू आखिर पालिका में आते क्यों हैं?

लेकिन फिल्म अभी खत्म नहीं हुई थी।

अगले दिन मैं फिर उसी चपरासी के पास पहुंच गया।

मैंने पूछा—
“कल आपने कहा था कहानी का ट्रेलर दिखाया है… अब पूरी फिल्म बताओ।”

चपरासी ने चाय की चुस्की ली और बोला—

“साहब, पूरी फिल्म समझनी है तो पहले एक बात समझ लो… पालिका में काम करने के लिए सिर्फ कुर्सी जरूरी नहीं होती, कुर्सी के आसपास दिखना भी जरूरी होता है!”

मैंने पूछा—“मतलब?”

वह बोला—

“मतलब ये कि मुनीश बाबू को पालिका की हर गली का रास्ता पता है। कौन आया, कौन गया… किसकी फाइल चली, किसकी अटकी… किसके कमरे में आज चाय बनी और किसके कमरे में आज मूड खराब है—इनका अपना नेटवर्क है।”

मैंने कहा—“लेकिन इनका काम क्या है?”

चपरासी मुस्कुराया—

“साहब, यही तो राज है! कुछ लोग काम करते हैं और कुछ लोग काम करवाने वालों के बीच अपनी मौजूदगी दर्ज करवाते हैं।”

मैंने कहा—“और चापलूसी?”

चपरासी बोला—

“वो तो इनका स्पेशल इफेक्ट है साहब!”

“स्पेशल इफेक्ट?”

“हां! नेता जी दिखाई दिए तो मुस्कान चालू… अधिकारी दिखाई दिए तो आदाब चालू… और कोई बड़ा आदमी आ जाए तो आवाज में इतनी मिठास कि चाय भी फीकी लगे!”

मैं हंस पड़ा।

चपरासी ने गंभीर होकर कहा—

“लेकिन साहब, एक बात माननी पड़ेगी… मुनीश बाबू की सबसे बड़ी खूबी यही है कि जहां बाकी लोग दरवाजा तलाशते हैं, वहां ये दरवाजे के बाहर ही अपना स्वागत कक्ष बना लेते हैं।”

मैंने पूछा—“और आगे?”

चपरासी ने चारों तरफ देखा और धीरे से बोला—

“आगे की कहानी तो अभी लिखी जानी है साहब… पालिका में नए लोग आए हैं, नई कुर्सियां आई हैं, नई उम्मीदें आई हैं… अब देखना है कि मुनीश बाबू की पुरानी निष्ठा नई व्यवस्था में कितना रंग दिखाती है।”

मैंने पूछा—“मतलब?”

वह बोला—

“मतलब साफ है साहब… फिल्म का हीरो बदल सकता है, सेट बदल सकता है, डायलॉग बदल सकते हैं… लेकिन कुछ किरदार हर पार्ट में बने रहते हैं।”

मैंने पूछा—“तो मुनीश बाबू कौन-सा किरदार हैं?”

चपरासी ने मुस्कुराकर कहा—

“साहब, वो किरदार नहीं… सीक्वल हैं!”

मैंने सिर खुजाया।

और बाहर निकलते हुए सोचा—

पालिका की फिल्म में कुर्सियां बदलती रहेंगी, सरकारें बदलती रहेंगी, चेहरे बदलते रहेंगे…

लेकिन अगर मुनीश बाबू की हाजिरी का रिकॉर्ड नहीं बदला तो—

“पिक्चर अभी बाकी है मेरे दोस्त!”

मुनीश बाबू की पालिका वाली फिल्म — तीसरी कड़ी

“हीरो बदल गए… लेकिन मुनीश बाबू का कैमियो जारी है!”

कहानी यहां खत्म हो सकती थी, लेकिन मुनीश बाबू की कहानी इतनी जल्दी खत्म होने वाली नहीं थी।

अगली सुबह मैं फिर पालिका पहुंचा।

गेट पर कदम रखा ही था कि चपरासी ने दूर से आवाज लगाई—

“आ गए साहब! आज मुनीश बाबू का नया एपिसोड है!”

मैंने पूछा—“आज क्या नया है?”

चपरासी बोला—

“आज देखिएगा… कौन किसे देखकर मुस्कुराता है और कौन किसके सामने कुर्सी सीधी करता है!”

मैंने कहा—“तुम भी कमाल करते हो।”

वह बोला—

“साहब, पालिका है… यहां फाइलों के साथ-साथ चेहरे भी पढ़ने पड़ते हैं।”

इतने में मुनीश बाबू का प्रवेश हुआ।

सफेद शर्ट… काली पेंट… चश्मा… चेहरे पर मुस्कान… और चाल में ऐसी आत्मविश्वास भरी रफ्तार, जैसे पालिका के नक्शे में उनका नाम भी दर्ज हो।

चपरासी ने धीरे से कहा—

“देखो साहब… बाबू साहब आ गए!”

मैंने पूछा—“आज इनकी ड्यूटी क्या है?”

वह बोला—

“ड्यूटी? अरे साहब, आप फिर वही गलती कर रहे हो। इनकी ड्यूटी पूछना ऐसा है जैसे फिल्म में इंटरवल के दौरान हीरो से पूछना कि आप किस विभाग में काम करते हैं!”

मैं हंस पड़ा।

तभी एक अधिकारी अंदर से निकले।

मुनीश बाबू ने मुस्कुराकर अभिवादन किया।

अधिकारी आगे बढ़ गए।

चपरासी बोला—

“देखा?”

मैंने कहा—“क्या?”

“यही तो कला है साहब… दो सेकंड का अभिवादन, लेकिन रिश्ते की पूरी फिल्म रिलीज!”

मैंने कहा—“तुम तो इनके बहुत बड़े प्रशंसक लगते हो।”

चपरासी बोला—

“प्रशंसक नहीं साहब… दर्शक हूं। पांच-छह साल से रोज यही फिल्म देख रहा हूं।”

मैंने पूछा—

“तो कहानी का क्लाइमेक्स कब आएगा?”

चपरासी ने मुस्कुराते हुए कहा—

“जब शहर पूछेगा कि मुनीश बाबू पालिका में क्यों आते हैं… और पालिका पूछेगी कि मुनीश बाबू आज आए क्यों नहीं!”

मैंने कहा—“फिर?”

चपरासी बोला—

“फिर साहब, वही होगा जो हर लंबी फिल्म में होता है…”

“क्या?”

उसने आंख दबाकर कहा—

“अगली फिल्म की घोषणा!”

मैं बाहर निकला तो लगा कि मामला सिर्फ एक आदमी का नहीं, बल्कि उस पुरानी व्यवस्था का है जहां कभी-कभी पद से ज्यादा पहचान, काम से ज्यादा पहुंच और योग्यता से ज्यादा ‘नजदीकी’ चर्चा में आ जाती है।

और मुनीश बाबू?

उनका किरदार अभी भी जारी है…

क्योंकि पालिका की इस फिल्म में इंटरवल भले कई बार हो जाए—
लेकिन ‘मुनीश बाबू’ का शो शायद अभी हाउसफुल चल रहा है! “पिक्चर अभी भी बाकी है मेरे दोस्त…

मुनीश बाबू की पालिका वाली फिल्म — चौथी कड़ी

“अब आया असली ट्विस्ट!”

मैंने सोचा था कहानी यहीं खत्म कर दूंगा।

लेकिन पालिका के चपरासी ने मेरा हाथ पकड़ लिया—

“साहब, इतनी जल्दी मत जाइए… अभी तो मुनीश बाबू की कहानी का असली ट्विस्ट बाकी है।”

मैंने कहा—“अब और क्या बाकी है?”

वह बोला—

“आपने देखा है न, कुछ लोग पालिका में काम से आते हैं… कुछ काम कराने आते हैं… और कुछ सिर्फ यह देखने आते हैं कि आज किससे कितनी नजदीकी बढ़ाई जा सकती है।”

मैंने पूछा—“मुनीश बाबू किस श्रेणी में आते हैं?”

चपरासी ने मुस्कुराकर कहा—

“साहब, इनकी श्रेणी अलग है… ये ‘स्थायी दर्शक’ हैं।”

मैंने पूछा—“स्थायी दर्शक?”

“हां! सरकार बदले, अधिकारी बदले, अध्यक्ष बदले, कर्मचारी बदले… लेकिन इनका टिकट हमेशा कन्फर्म!”

मैं हंसा और बोला—

“तो क्या पालिका में इनका कोई स्थायी कमरा भी है?”

चपरासी बोला—

“कमरा तो नहीं साहब… लेकिन पहचान इतनी पक्की है कि कभी-कभी लगता है नाम की प्लेट बाहर लगे या न लगे, चेहरा देखकर ही प्रवेश मिल जाता होगा!”

मैंने कहा—

“लेकिन भाई, आखिर ये करते क्या हैं?”

इस बार चपरासी चुप हो गया।

दो सेकंड बाद बोला—

“साहब… यही तो शहर का सबसे बड़ा सवाल है।”

मैंने पूछा—

“और जवाब?”

वह बोला—

“जवाब किसी फाइल में नहीं है साहब… जवाब तो फाइलों के बीच घूमता है!”

मैंने कहा—“मतलब?”

वह बोला—

“मतलब ये कि पालिका में कौन कितना काम करता है, यह तो रिकॉर्ड बताएगा। लेकिन कौन कितना दिखाई देता है, इसका कोई रजिस्टर नहीं होता।”

मैं कुछ देर चुप रहा।

फिर मैंने पूछा—

“तो मुनीश बाबू की सबसे बड़ी उपलब्धि क्या है?”

चपरासी ने बिना एक सेकंड गंवाए कहा—

“साहब, पांच-छह साल से रोज पालिका में दिखाई देना… बिना सरकारी हाजिरी रजिस्टर में नाम लिखाए!”

मैंने कहा—“लेकिन अगर कोई नियम-विरुद्ध काम हो तो?”

चपरासी तुरंत गंभीर हो गया—

“तब साहब, न मुनीश बाबू बचेंगे, न कोई और। आखिर पालिका किसी की निजी जागीर तो है नहीं। नियम सबके लिए बराबर होने चाहिए।”

मैंने कहा—

“फिर इस पूरी कहानी का मतलब?”

चपरासी ने मुस्कुराकर कहा—

“मतलब इतना ही साहब…
पालिका में पहचान बनाना बुरी बात नहीं,
लेकिन पहचान ऐसी भी न हो जाए कि लोग काम से पहले आपका नाम और नियमों से पहले आपकी पहुंच देखने लगें।”

मैंने सिर हिलाया।

बाहर निकलते हुए मैंने आखिरी बार पालिका की तरफ देखा।

गेट पर मुनीश बाबू फिर दिखाई दिए।

चपरासी ने पीछे से आवाज लगाई—

“साहब! कल फिर आइएगा…”

मैंने पूछा—“क्यों?”

वह बोला—

**“क्योंकि मुनीश बाबू की फिल्म में अभी एक सवाल बाकी है—

‘बाबू साहब’ की हाजिरी आखिर किस रजिस्टर में लगती है?”**

मैं मुस्कुराया और आगे बढ़ गया।

पीछे से चपरासी की आवाज फिर आई—

“और हां साहब… इस फिल्म का अंत मत लिखना।
पालिका में अच्छे किरदार बदल जाते हैं,
लेकिन कुछ किरदार… अगली सरकार में भी मिल जाते हैं!”

—पर्दा गिरता है… मगर कहानी जारी है।

मुनीश बाबू की पालिका वाली फिल्म — पांचवीं कड़ी

“हीरो कौन है, विलेन कौन… यह तो इंटरवल के बाद पता चलेगा!”

अगले दिन मैं पालिका पहुंचा तो माहौल कुछ अलग था।

चपरासी ने मुझे देखते ही कहा—

“साहब! आज जांच होने वाली है।”

मैं चौंका—“किस बात की?”

वह बोला—

“मुनीश बाबू की!”

मैंने पूछा—“क्या हुआ?”

चपरासी हंस पड़ा—

“अरे साहब, घबराइए मत। जांच यह नहीं होनी कि उन्होंने क्या किया… जांच यह होनी है कि वह रोज आते क्यों हैं!”

मैं भी हंस पड़ा।

तभी सामने से मुनीश बाबू आते दिखाई दिए।

चपरासी ने धीरे से कहा—

“देखो साहब… कैमरा ऑन!”

मुनीश बाबू ने इधर देखा, उधर देखा और फिर किसी परिचित को देखकर मुस्कुराए।

चपरासी बोला—

“कट! मुस्कान बिल्कुल सही थी… टेक वन ओके!”

मैंने कहा—“तुम्हें फिल्म बनाने का बहुत शौक है क्या?”

वह बोला—

“साहब, रोज पालिका में रहो तो जिंदगी खुद फिल्म बन जाती है।”

मैंने पूछा—

“लेकिन इस फिल्म में मुनीश बाबू का रोल क्या है?”

चपरासी ने कहा—

“रोल अभी तय नहीं हुआ साहब। कभी लगता है सपोर्टिंग आर्टिस्ट हैं, कभी लगता है प्रोड्यूसर के करीबी हैं, और कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि पूरी फिल्म के पोस्टर पर इनका नाम अलग से छपना चाहिए!”

मैंने कहा—

“लेकिन असली हीरो कौन है?”

चपरासी ने बिना सोचे कहा—

“असली हीरो? जनता!”

मैंने पूछा—

“और जनता क्या चाहती है?”

वह बोला—

“जनता चाहती है कि पालिका में काम हो, नियम से हो और सबके लिए बराबर हो।”

मैंने कहा—

“और मुनीश बाबू?”

चपरासी मुस्कुराया—

“उनका क्या है साहब… उन्हें तो हर सरकार में अपना रोल मिल ही जाता है!”

मैंने पूछा—

“इतना भरोसा?”

वह बोला—

“भरोसा नहीं साहब… अनुभव!”

मैंने कहा—

“तो फिर अगली सरकार आएगी तो?”

चपरासी ने चाय खत्म की और बोला—

“नई सरकार आएगी… नई कुर्सियां आएंगी… नए चेहरे आएंगे… और अगर मुनीश बाबू की किस्मत अच्छी रही तो—पुराना कैमियो भी जारी रहेगा!”

मैंने कहा—

“फिर तो फिल्म का नाम बदल देना चाहिए।”

वह बोला—

“क्या रखें?”

मैंने कहा—

“मुनीश बाबू—द रिटर्न ऑफ द बाबू!”

चपरासी जोर से हंसा।

फिर अचानक गंभीर होकर बोला—

“लेकिन साहब, एक बात याद रखना…”

मैंने पूछा—“क्या?”

उसने पालिका भवन की तरफ देखते हुए कहा—

“पालिका किसी व्यक्ति की नहीं होती। कुर्सी आती-जाती रहती है। असली ताकत जनता के सवाल और नियम-कायदे हैं।”

मैंने पूछा—

“तो मुनीश बाबू की कहानी का अंत?”

वह बोला—

**“अंत तब होगा साहब, जब पालिका में किसी के आने-जाने की खबर नहीं…

उसके काम की खबर मायने रखेगी।”**

मैंने मुस्कुराकर कहा—

“वाह! आज तो चपरासी भी दार्शनिक हो गया।”

वह बोला—

“क्या करें साहब… पांच साल से पालिका में हूं। यहां फाइलों से ज्यादा किरदार देखे हैं!”

और मैं बाहर निकल आया।

पीछे मुड़कर देखा तो मुनीश बाबू फिर पालिका के गेट पर थे।

मैंने मन ही मन कहा—

“लगता है कहानी का क्लाइमेक्स अभी दूर है…”

और स्क्रीन पर जैसे फिल्मी अक्षरों में लिखा आया—

“TO BE CONTINUED…”

मुनीश बाबू की पालिका वाली फिल्म — क्लाइमेक्स

“अब पर्दा उठेगा… मगर किरदार वही रहेंगे!”

अगले दिन मैं पालिका नहीं गया।

सोचा, एक दिन मुनीश बाबू के बिना भी शहर चल सकता है या नहीं, इसका प्रयोग कर लिया जाए।

सुबह चाय की दुकान पर बैठा ही था कि मोबाइल बजा।

उधर से वही पालिका वाला चपरासी—

“साहब! आज पालिका में नहीं आए?”

मैंने कहा—“नहीं।”

वह बोला—
“क्यों?”

मैंने कहा—“आज छुट्टी ले ली।”

वह हंसकर बोला—

“साहब, आप भी कमाल करते हो! छुट्टी लेने के लिए पहले पालिका में नौकरी तो होनी चाहिए!”

मैंने कहा—“अच्छा ये बताओ, आज मुनीश बाबू आए?”

वह बोला—

“साहब, यही तो खबर है!”

मैंने उत्सुकता से पूछा—“क्या हुआ?”

वह बोला—

“आज भी आ गए!”

मैंने माथा पकड़ लिया।

पूछा—“क्यों?”

चपरासी बोला—

“कहते हैं पालिका से पुराना लगाव है।”

मैंने कहा—“लगाव तो ठीक है, लेकिन इतना लगाव?”

वह बोला—

“साहब, कुछ लोगों को मंदिर में आस्था होती है, कुछ को राजनीति में… और कुछ को पालिका के गलियारों में!”

मैं हंस पड़ा।

फिर उसने कहा—

“लेकिन साहब, असली कहानी मुनीश बाबू की नहीं है।”

मैं चौंका—

“तो किसकी है?”

वह बोला—

“हम सबकी!”

मैंने पूछा—“कैसे?”

वह बोला—

“क्योंकि हम ही तो तय करते हैं कि किसे ‘बाबू’ बनाना है, किसे बड़ा आदमी समझना है और किसकी हर मौजूदगी को जरूरी मान लेना है।”

मैं चुप हो गया।

वह आगे बोला—

“पालिका में कोई व्यक्ति रोज आता है तो उससे सवाल होना चाहिए—किस काम से आए? किस हैसियत से आए? क्या काम हुआ? नियम क्या कहते हैं?”

“लेकिन हम पूछते हैं—‘किसके आदमी हैं?’”

मैंने कहा—“बात तो सही है।”

चपरासी बोला—

“और यही से असली फिल्म शुरू होती है साहब।”

मैंने पूछा—

“कैसी फिल्म?”

वह मुस्कुराया—

“जिसमें कुर्सी पर बैठा आदमी बदल जाता है…
कुर्सी बदल जाती है…
सरकार बदल जाती है…
लेकिन कुर्सी के आसपास घूमने वाले किरदार अक्सर वही रहते हैं!”

मैंने कहा—

“तो मुनीश बाबू?”

वह बोला—

“मुनीश बाबू तो बस एक किरदार हैं साहब। असली कहानी उस मानसिकता की है, जहां काम से ज्यादा पहुंच, नियम से ज्यादा पहचान और योग्यता से ज्यादा नजदीकी चर्चा में आ जाती है।”

मैंने कहा—

“और इसका इलाज?”

चपरासी ने चाय का आखिरी घूंट लिया और बोला—

“इलाज बहुत आसान है साहब—पालिका में आदमी नहीं, नियम पहचाने जाएं।”

मैंने पूछा—

“और अगर ऐसा हो गया?”

वह हंसकर बोला—

“फिर मुनीश बाबू भी मुनीश बाबू नहीं रहेंगे…
बस मुनीश रह जाएंगे!”

मैं जोर से हंस पड़ा।

तभी सामने से मुनीश बाबू आते दिखाई दिए।

चपरासी ने मुझे कोहनी मारी—

“लो साहब… सीक्वल का हीरो फिर आ गया!”

मैंने कहा—

“अब क्या होगा?”

चपरासी बोला—

“कुछ नहीं साहब… फिल्म चलती रहेगी।
बस इस बार दर्शक तय करेंगे कि तालियां किसे मिलेंगी!”

मैंने पालिका की तरफ देखा।

गेट खुला था।

किरदार अंदर जा रहे थे।

फाइलें घूम रही थीं।

कुर्सियां अपनी जगह थीं।

और शहर बाहर खड़ा होकर इंतजार कर रहा था—

काम का।

**पर्दा गिरा…

लेकिन सवाल खुला रह गया—
पालिका में हाजिरी किसकी होनी चाहिए—किरदारों की या काम की?**

—पिक्चर अभी खत्म नही हुई मेरे दोस्त ?

मुनीश बाबू : फिल्म का आखिरी सीन…

मैंने चपरासी से आखिरी बार पूछा—
“भाई, एक बात बता… अगर कल मुनीश बाबू पालिका आना बंद कर दें तो क्या होगा?”

चपरासी कुछ देर चुप रहा।

फिर बोला—

“साहब, पालिका का काम तो चलता रहेगा।”

मैंने कहा—“फिर?”

वह हंसते हुए बोला—

“बस एक चीज की कमी महसूस होगी…”

मैंने पूछा—“किसकी?”

वह बोला—

“गेट से अंदर आते ही यह पता नहीं चलेगा कि आज पालिका में कौन-कौन मौजूद है!”

मैं हंस पड़ा।

लेकिन चपरासी की अगली बात ने हंसी रोक दी।

वह बोला—

“साहब, असली बात ये है कि पालिका किसी मुनीश बाबू, किसी चेयरमैन या किसी अधिकारी की नहीं होती। पालिका शहर की होती है। यहां कुर्सियां बदलती रहेंगी, चेहरे बदलते रहेंगे, सरकारें बदलती रहेंगी… लेकिन जनता के पैसे और जनता के काम का हिसाब नहीं बदलना चाहिए।”

मैंने पूछा—

“और मुनीश बाबू?”

चपरासी ने दूर जाते मुनीश बाबू को देखा और मुस्कुराकर कहा—

“वो तो साहब… फिल्म का ऐसा किरदार हैं, जिनका रोल छोटा हो या बड़ा, एंट्री रोज होती है!”

मुनीश बाबू सफेद शर्ट, काली पेंट, काला चश्मा और चमचमाते जूतों में पालिका की तरफ बढ़ते रहे।

मैंने सोचा—

नौकरी नहीं, फिर भी बाबू।
कुर्सी नहीं, फिर भी दरबार।
हाजिरी का रजिस्टर नहीं, फिर भी रोज का आगमन।

आखिर में मैंने चपरासी से कहा—

“चलो भाई, अब फिल्म खत्म करते हैं।”

वह मुस्कुराया और बोला—

**“फिल्म खत्म कर दो साहब…

लेकिन मुनीश बाबू का ‘रोज का शो’ बंद मत करना।
शहर को मनोरंजन भी तो चाहिए!”**

मैंने पीछे मुड़कर पालिका को देखा।

गेट खुला था…

मुनीश बाबू अंदर जा चुके थे…

और मन में एक ही सवाल रह गया—

**“पालिका में रोज हाजिरी लगाने वाला बाबू कौन है—

मुनीश बाबू… या शहर की व्यवस्था?”**

पर्दा गिरता है…
तालियां बजती हैं…
और स्क्रीन पर आखिरी लाइन आती है—

“अगली सरकार, अगली कुर्सी… और शायद मुनीश बाबू का अगला एपिसोड!”

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