मुनीश बाबू का नया कमाल!
नाली पर लोहे का जाल पालिका ने लगाया… लेकिन श्रेय पहुंच गया मुनीश बाबू के खाते में!

शहर की राजनीति भी गजब की चीज है साहब…
यहां अब काम होने से ज्यादा जरूरी शायद यह हो गया है कि काम का श्रेय किसके नाम से छपे।
इसी राजनीति में इन दिनों मुनीश बाबू की भी अपनी अलग पहचान बनती दिखाई दे रही है।
मुनीश बाबू का रोजाना पालिका में आना-जाना बना रहता है। टेंडर, फाइल, पट्टे और पालिका से जुड़े कामकाज के बीच उनकी मौजूदगी दिखाई देती रहती है।
लेकिन अब लगता है कि उनकी असली ताकत कहीं और है—
नारदमुनि की संतानों का कनेक्शन!
कहते हैं नारदमुनि तीनों लोकों में खबर पहुंचाने के लिए प्रसिद्ध थे।
आज उनकी संतानों ने शायद यह हुनर अपडेट कर लिया है—
काम कहीं भी हो… खबर सही जगह पहुंचनी चाहिए और श्रेय सही नाम तक!
अब देखिए नाली का मामला।
नाली लंबे समय से परेशानी का कारण बनी हुई थी। आखिरकार पालिका प्रशासन ने वहां लोहे का जाल लगवा दिया।
काम पालिका ने किया।
व्यवस्था पालिका ने की।
जाल पालिका ने लगवाया।
जनता को राहत पालिका के काम से मिली।
लेकिन जैसे ही जाल लगा…
श्रेय की खबर दौड़ पड़ी।
बताया जाने लगा—
“मुनीश बाबू की जागरूकता से नाली पर लोहे का जाल लग गया!”
पालिका के पुराने चपरासी ने खबर सुनी तो चाय का गिलास हाथ में ही रुक गया।
बोला—
“अरे भाई, मुनीश बाबू ने किया क्या?”
चाय वाला बोला—
“यही तो पता नहीं!”
चपरासी—
“शिकायत की?”
“पता नहीं।”
“लिखित आवेदन दिया?”
“पता नहीं।”
“अधिकारी को बताया?”
“उसका भी पता नहीं।”
चपरासी ने माथा खुजाया और बोला—
“फिर श्रेय?”
चाय वाला मुस्कुराया—
“वही तो नारदमुनि की संतानों का कमाल है चचा!”
बुजुर्ग ने चाय की चुस्की लेते हुए कहा—
“नारदमुनि तो खबर पहुंचाते थे, लेकिन आजकल उनकी संतानों ने खबर के साथ श्रेय पहुंचाने की सुविधा भी शुरू कर दी है!”
चपरासी बोला—
“मतलब काम पालिका करे और श्रेय किसी और के खाते में?”
चाय वाला—
“बिल्कुल! इसे कहते हैं आधुनिक राजनीतिक डाक सेवा—काम का पता पालिका, श्रेय का पता मुनीश बाबू!”
थड़ी पर ठहाका गूंज उठा।
बुजुर्ग बोले—
“पालिका में आना-जाना अपनी जगह है बेटा, लेकिन किसी काम में वास्तविक भूमिका होना अलग बात है।”
चाय वाला बोला—
“बिल्कुल। पालिका में दिखाई देना और पालिका का काम करवाना एक ही बात थोड़े ही है!”
चपरासी ने बात आगे बढ़ाई—
“अब कल सफाई कर्मचारी झाड़ू लगाएगा तो खबर आएगी—मुनीश बाबू की जागरूकता से सड़क साफ!”
चाय वाला बोला—
“स्ट्रीट लाइट जलेगी—मुनीश बाबू की जागरूकता से शहर रोशन!”
बुजुर्ग—
“नल में पानी आएगा—मुनीश बाबू की जागरूकता से पानी जनता के घर पहुंचा!”
चपरासी—
“और बारिश हो गई?”
चाय वाला तुरंत बोला—
“नारदमुनि की संतानों के माध्यम से खबर आएगी—मुनीश बाबू की जागरूकता से बादल सक्रिय!”
दुकान पर फिर ठहाका।
लेकिन मजाक के बीच सवाल गंभीर है।
अगर मुनीश बाबू ने वास्तव में समस्या उठाई हो, शिकायत की हो या संबंधित अधिकारियों का ध्यान दिलाया हो तो उसका तथ्य सामने आना चाहिए।
लेकिन अगर इस लोहे के जाल को लगवाने में उनका कोई रोल ही नहीं था, तो फिर श्रेय किस आधार पर?
सिर्फ पालिका में रोजाना आने-जाने से क्या हर काम में योगदान दर्ज हो जाता है?
सिर्फ फाइल, टेंडर और पट्टों के आसपास मौजूदगी से क्या नाली पर लगने वाला जाल भी अपने आप किसी के खाते में चला जाता है?
और अगर ऐसा ही है तो फिर आगे की खबरें लिखना भी आसान है।
काम कोई करे…
नाम किसी का हो…
और खबर नारदमुनि की संतानों की पहुंच से सीधे मंजिल तक!
चपरासी ने अखबार मोड़ा और बोला—
“साहब, अब समझ आया। नाली पर जाल लोहे का लगा है, लेकिन श्रेय का जाल बड़ा महीन बुना गया है!”
चाय वाला बोला—
“और उसमें मुनीश बाबू बिना कदम रखे ही पहुंच गए!”
बुजुर्ग मुस्कुराए—
“इसे कहते हैं राजनीति का नया फॉर्मूला—
काम में भूमिका शून्य,
खबर में भूमिका पूरी,
और श्रेय में नाम सबसे आगे!”
तभी फिर आवाज आई—
“नारायण… नारायण!”
चाय वाला आसमान की ओर देखकर बोला—
“नारदमुनि की संतानों को सलाम है… खबर पहुंचाने की कला आज भी जिंदा है!”
चपरासी बोला—
“बस फर्क इतना है कि अब खबर अकेली नहीं जाती… उसके साथ श्रेय भी पैक होकर जाता है!”
और चाय वाले ने आखिरी पंच मारा—
“पालिका ने नाली पर लोहे का जाल लगाया, लेकिन नारदमुनि की संतानों ने ऐसा जाल बुना कि मुनीश बाबू का रोल दिखाई न देने के बावजूद श्रेय पूरा दिखाई दे गया!”
बुजुर्ग ने मुस्कुराकर कहा—
“नारायण… नारायण!
काम जमीन पर पालिका का,
नाम खबर में मुनीश बाबू का,
और बीच में नारदमुनि की संतानों का कमाल!”
कहानी जारी है… क्योंकि नाली का जाल लग चुका है। अब देखना यह है कि अगली बार पालिका कौन सा काम करेगी और नारदमुनि की संतानों का कनेक्शन किसके नाम तक श्रेय पहुंचाएगा!
पिक्चर अभी बाकी है मेरे दोस्त….



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shandar.