मुनीश बाबू का नारद कनेक्शन!
पालिका प्रेम में नया ट्विस्ट, खबरों की आहट मिलते ही मुनीश बाबू दौड़े ‘नारदमुनि की संतानों’ के दरबार!

सुबह का वक्त था। शहर अभी नींद से आंखें मल ही रहा था। चाय की दुकानों पर पहली चुस्की और पान की दुकानों पर राजनीति की पहली गपशप शुरू हो चुकी थी।
उधर पालिका में भी रोज की तरह आवाजाही शुरू हो गई थी।
तभी एंट्री हुई—मुनीश बाबू की!
सफेद शर्ट, काली पेंट, आंखों पर काला चश्मा और चाल ऐसी कि लगता था जैसे पालिका का कामकाज नहीं, बल्कि शहर का पूरा राजकाज इनके कंधों पर हो!
पालिका के पुराने चपरासी ने दूर से देखा और धीरे से बोला—
“लो साहब… आज फिर पालिका में सूरज से पहले मुनीश बाबू का उदय हो गया!”
मैंने पूछा—
“क्यों भई, आज क्या खास है?”
चपरासी ने आंख दबाते हुए कहा—
“साहब, आजकल बाबूजी को पालिका से ज्यादा खबरों की चिंता ज्यादा है”।
मैंने कहा—
“मतलब?”
चपरासी बोला—
“पहले रोज हाजिरी लगाने आते थे… अब लगता है खबरों की भी हाजिरी लगाने लगे हैं!”
मैं हंस पड़ा।
लेकिन चपरासी का अगला वाक्य सुनकर मामला थोड़ा दिलचस्प लगा।
“साहब, आजकल नारदमुनि की संतानों की तरफ इनकी नजर कुछ ज्यादा है।”
अब मामला समझ में आने लगा।
चर्चाओं के मुताबिक, मुनीश बाबू के घनिष्ठ मित्र, जो हालिया चुनावी उठापटक के बाद पालिका के सरताज बने हैं, पालिका के कुछ ‘अंदरूनी अध्याय’ नारदमुनि की संतानों को मालूम होने की चर्चाएं हैं।
अब अगर ये अध्याय खबर बनकर बाहर निकल पड़े तो?
बस यही सवाल शायद मुनीश बाबू को अंदर ही अंदर परेशान कर रहा था।
उन्होंने चश्मा ठीक किया।
चारों तरफ देखा।
और मन ही मन बोले—
“पालिका में बहुत काम पड़े हैं… लेकिन पहले यह काम जरूरी है!”
काल्पनिक साथी ने पूछा—
“कौन सा काम बाबूजी?”
मुनीश बाबू बोले—
“चलो… नारदमुनि की संतानों से मिलकर आते हैं!”
नारदमुनि की संतानों के दरबार में मुनीश बाबू को देखते ही सामने से आवाज आई—
“आइए बाबूजी! आज कैसे याद किया?”
मुनीश बाबू ने मुस्कुराते हुए कहा—
“बस… ऐसे ही हालचाल पूछने चला आया था।”
सामने से तुरंत जवाब आया—
“हालचाल तो मोबाइल पर भी पूछ लेते हो बाबूजी… आज मोबाइल छोड़कर खुद कैसे आ गए?”
बस!
मुनीश बाबू की मुस्कान ने वहीं से छुट्टी ले ली।
कुछ पल खामोशी रही।
फिर बाबूजी ने गला साफ किया और बोले—
“बस… आप अपने सभी नारद भाइयों को थोड़ा समझाइए। अगर मुझसे कोई गलती हुई हो तो क्षमा याचना करता हूं। आखिर अपने ही लोग हैं… बात को ज्यादा आगे बढ़ाने से क्या फायदा!”
नारदमुनि की संतान मुस्कुराई।
मुनीश बाबू भी मुस्कुराए।
दोनों मुस्कुराए…
लेकिन किसकी मुस्कान में क्या राज था, यह भगवान ही जाने!
मुनीश बाबू वहां से निकल लिए।
लेकिन असली मजा तो इसके बाद आया!
दरबार से निकलकर मुनीश बाबू सीधे बस स्टैंड की पान की दुकान पर पहुंचे।
वहां देखा तो चर्चा फिर वही—
नारदमुनि की संतानों की!
मुनीश बाबू ने पान वाले से पूछा—
“क्यों भैया, आज इतनी चर्चा किस बात की है?”
पान वाला बोला—
“बाबूजी, आजकल खबर से ज्यादा खबर की चिंता बिक रही है… पान बाद में, चर्चा पहले!”
पास बैठे बुजुर्ग ने पान की पीक संभाली और बोले—
“बेटा, नारदजी के जमाने में खबर पहुंचाने के लिए नारदजी घूमते थे… आजकल खबर खुद घूमती है। फर्क इतना है कि पहले खबर पहुंचती थी, अब खबर पहुंचने से पहले उसकी चिंता पहुंच जाती है!”
दुकान पर बैठे लोग ठहाका मारकर हंस पड़े।
मुनीश बाबू भी हंसे।
लेकिन हंसी के पीछे चिंता थी या चुटकुले का असर—यह तो मुनीश बाबू ही जानें!
अगले दिन पालिका में फिर चपरासी से मुलाकात
मैंने पूछा—
“क्यों भई, मुनीश बाबू आए?”
चपरासी बोला—
“आए थे साहब… लेकिन आज बड़ी जल्दी में थे।”
मैंने पूछा—
“कहां गए?”
चपरासी बोला—
“पता नहीं साहब। आजकल बाबूजी की लोकेशन पूछो तो गूगल मैप भी सोच में पड़ जाए!”
मैं हंस पड़ा।
फिर चपरासी अचानक गंभीर हुआ और बोला—
“साहब, एक बात बताऊं?”
मैंने कहा—
“बता।”
बोला—
“यहां दो चीजें बहुत तेजी से घूमती हैं—खबर और फाइल।”
मैंने पूछा—
“फिर काम किससे होता है?”
चपरासी बोला—
“साहब, यही तो शहर का सबसे बड़ा सवाल है!”
और फिर उसने धीरे से कहा—
“जनता की भी कई फाइलें पड़ी हैं साहब… नाली की, सफाई की, सड़क की, स्ट्रीट लाइट की। काश उन पर भी मुनीश बाबू जितनी तेजी दिखाई देती!”
बस…
चपरासी की बात में मजाक था, लेकिन सवाल बड़ा गंभीर था।
जनता को ‘पालिका प्रेम’ नहीं, पालिका का काम चाहिए
शहर की जनता को इससे कोई खास मतलब नहीं कि पालिका के गलियारों में कौन किसका कितना करीबी है।
उसे मतलब है—
नाली साफ है या नहीं?
सड़क बनी या नहीं?
स्ट्रीट लाइट जल रही है या नहीं?
अतिक्रमण पर कार्रवाई हो रही है या नहीं?
सफाई नियमित हो रही है या नहीं?
और सबसे बड़ा सवाल—
पालिका में काम नियम से हो रहा है या रिश्तों और पहचान से?
यही असली मुद्दा है।
दोस्ती अपनी जगह।
व्यापार अपनी जगह।
राजनीति अपनी जगह।
लेकिन पालिका जनता की है और जनप्रतिनिधि जनता के जवाबदेह हैं।
कुर्सी पर बैठते ही कोई व्यक्ति कुर्सी का मालिक नहीं बन जाता।
कुर्सी जनता देती है और जनता ही हिसाब भी मांगती है।
इसलिए अगर किसी ‘अंदरूनी अध्याय’ को लेकर सवाल उठते हैं तो उसका जवाब खबर रोकने में नहीं, बल्कि तथ्यों और दस्तावेजों के साथ जवाब देने में है।
क्योंकि खबर से डरने के बजाय सवाल का जवाब देना ही लोकतंत्र की खूबसूरती है।
और खबर लिखने वालों का काम सवाल उठाना है—फैसला सुनाना नहीं।
अब लौटते हैं मुनीश बाबू पर…
अगली सुबह फिर वही सफेद शर्ट…
वही काली पेंट…
वही काला चश्मा…
और वही पालिका की ओर बढ़ते कदम।
चपरासी ने दूर से आवाज लगाई—
“बाबूजी!”
मुनीश बाबू रुके।
चपरासी बोला—
“आज खबर की नाड़ी देखने आए हो या शहर की नाली?”
मुनीश बाबू ने चश्मे के ऊपर से देखा और मुस्कुराकर आगे बढ़ गए।
चपरासी मेरी तरफ देखकर बोला—
“साहब… जवाब नहीं दिया। लगता है आज फिर कोई नया अध्याय लिखने वाला है!”
मैं भी मुस्कुरा दिया।
क्योंकि इस कहानी में अभी बहुत कुछ बाकी है।
अंत में बस इतना…
पालिका में हाजिरी लगाना आसान है,
लेकिन जनता के काम की हाजिरी लगाना असली परीक्षा है।
नारदमुनि की संताने खबर लेकर आएं या सवाल लेकर—
जनता को आखिर में खबर नहीं, काम चाहिए।
और जनता सब देख रही है…
कौन पालिका में आता है, कौन किसके साथ जाता है, किस मुद्दे पर चुप रहता है और किस मुद्दे पर अचानक सक्रिय हो जाता है।
इसलिए जनाब…
मुनीश बाबू का नारद कनेक्शन अभी खत्म नहीं हुआ है!
नारद कनेक्शन नया अध्याय है,
पालिका की असली कहानी अभी बाकी है…
और जनता का सवाल—“काम कब होगा?”—अभी सबसे बड़ा सवाल है!
पिक्चर अभी बाकी है मेरे दोस्त….


