“अस्थायी महल, स्थायी सवाल… कहीं रुई का पेच न बिगाड़ दे पूरा खेल!”
नए-नवेले पालिका दरबार के मुखिया जी इन दिनों शहर में विकास से ज्यादा “माला-साफों के माननीय” बनने को लेकर चर्चित हैं। जहां स्वागत-सम्मान का बुलावा आया, मुखिया जी पहुंच गए; माला पड़ी, साफा बंधा और साथ में वही लोकप्रिय डायलॉग—“आपके वार्ड के विकास में कोई कमी नहीं आएगी।” 
जनता बोली—वाह! डायलॉग तो विकास वाला है, अब विकास भी दिख जाए तो मजा आ जाए!
शहर में सड़कें जगह-जगह गड्ढों से संवाद कर रही हैं, नालियां अपनी दुर्दशा पर आंसू बहा रही हैं और कई इलाकों की लाइटें शायद ‘अच्छे दिनों’ का इंतजार कर रही हैं। लेकिन इन सबके बीच चर्चा है लाखों रुपये की लागत वाले अस्थायी चैंबर की।
अब जनता भी पूछ रही है—“मुखिया जी, चैंबर अस्थायी है या खर्च?”
दरबार सजने की तैयारी है, महल अस्थायी है और स्वागत स्थायी! बस शहर की सड़कें बेचैन हैं कि उनका नंबर कब आएगा।
मुखिया जी, कभी इन सड़कों पर भी अपने विकास रथ की सवारी कर लीजिए। कहीं ऐसा न हो कि दो साल बाद पहिया गड्ढे में फंसे और दरबारी दौड़कर कहें—
“मुखिया जी, चैंबर तो बच गया… लेकिन रथ गया!”
और हां, दरबारियों की तालियां सुनते-सुनते जनता की आवाज धीमी मत होने दीजिए। क्योंकि चैंबर अस्थायी है, लेकिन जनता के सवाल स्थायी हैं। कहीं इस महत्वाकांक्षी योजना में रुई का कोई ऐसा पेच न निकल आए, जिसे सुलझाते-सुलझाते पूरा दरबार ही उलझ जाए!


