माला-साफे और यात्रा से नहीं, काम से बदलेगा शहर…?
हमारे शहर में विकास की नई परिभाषा बड़ी तेजी से लोकप्रिय हो रही है—अधिकारी ने शहर में कदम रखा नहीं कि स्वागत समिति कदमताल करते हुए पहुंच गई!
साहब ने अभी पदभार संभाला भी नहीं, कुर्सी की धूल तक नहीं झाड़ी और इधर माला-साफा लेकर स्वागत करने वालों की लाइन लग गई। मोबाइल कैमरे ऐसे निकलते हैं जैसे अधिकारी नहीं, कोई फिल्मी सितारा शहर में शूटिंग करने आया हो।
माला पहनाइए, साफा बांधिए, बुके दीजिए, फोटो खिंचाइए और फिर सोशल मीडिया पर लिख दीजिए—
“शहर के विकास को लेकर सार्थक चर्चा।”
सार्थक चर्चा में क्या हुआ, यह भगवान जाने; लेकिन फोटो में मुस्कान ऐसी कि शहर की सारी समस्याएं उसी वक्त हल हो गई हों!
अधिकारी जी अभी फाइलें देखेंगे, शहर समझेंगे, व्यवस्था जानेंगे… लेकिन स्वागतकर्ताओं को इतनी जल्दी किस बात की है? शायद डर हो कि साहब ने काम शुरू कर दिया तो स्वागत का मौका कहीं निकल न जाए!
अब यही माला-साफा संस्कृति पालिका तक भी पहुंच गई है। चुनाव जीतकर आए जनप्रतिनिधियों का स्वागत ऐसा हो रहा है मानो शहर में नए पार्षद नहीं, विकास की बारात आई हो।
आज फलां ने माला पहनाई, कल फलां ने साफा बांधा, परसों कोई शॉल ओढ़ाएगा। फिर ग्रुप फोटो, फिर फेसबुक पोस्ट और फिर कमेंट—“ऐतिहासिक स्वागत!”
बस एक चीज ऐतिहासिक नहीं बदल रही—शहर की सड़कें!
कहीं गड्ढा है तो वह भी वर्षों से अपनी जगह डटा हुआ है। नाली जाम है तो उसे भी अपनी नौकरी से प्यार है। गली की लाइट बंद है तो वह भी शायद “अच्छे दिनों” का इंतजार कर रही है।
और जनप्रतिनिधियों की व्यस्तता भी देखिए। कोई वार्डवासियों को धार्मिक यात्रा करवाने में व्यस्त है, कोई दावत में व्यस्त है। सेवा के नाम पर कार्यक्रमों की कमी नहीं, लेकिन सड़क-सफाई-नाली-रोशनी के मुद्दे शायद अगले कार्यक्रम की तारीख पूछते-पूछते थक गए हैं।
यात्रा कराइए, दावत दीजिए—जनता को खुशियां मिलें, इसमें बुराई नहीं। मगर भाई साहब, वार्ड को पर्यटन स्थल और पेट को विकास का पैमाना मत बनाइए।
जनता ने आपको सिर्फ यह तय करने के लिए नहीं चुना कि किस दिन किसे माला पहनानी है और किस दिन किसे दावत खिलानी है। जनता ने आपको इसलिए चुना है कि वार्ड की हालत सुधरे।
अब जरा माला उतारिए, साफा संभालिए और संकल्प पत्र निकालिए।
देखिए उसमें कितने वादे हैं और उनमें से कितनों पर काम शुरू हुआ है।
क्योंकि अब जनता को
फोटो नहीं—काम चाहिए।
स्वागत नहीं—सुविधा चाहिए।
दावत नहीं—विकास चाहिए।
वरना अगली बार स्वागत के मंच पर शायद जनता भी एक माला लेकर पहुंचेगी।
फूलों की नहीं…
लंबित वादों की माला!
और पूछेगी—
“साहब, साफे तो बहुत बंध गए… अब बताइए, हमारे शहर के सिर पर विकास का साफा कब बंधेगा?”


