माला, साफा और माइक… मुनीश बाबू का नया अवतार!

पालिका के चपरासी ने आज एक नई खबर सुनाई…
बोला—
“साहब… मुनीश बाबू का प्रमोशन हो गया!”
मैंने पूछा—
“अरे! क्या पार्षद बन गए? कोई पद मिल गया? पालिका ने कोई जिम्मेदारी दे दी?”
चपरासी ठहाका मारकर बोला—
“अरे साहब, पद-वद कुछ नहीं मिला… बस दोस्त पालिका के सरताज बन गए हैं!”
मैंने कहा—“तो इसमें प्रमोशन कहां से आ गया?”
चपरासी बोला—
“पहले मुनीश बाबू पालिका में आते-जाते थे… अब पालिका से निकलकर जनता के बीच माला, साफा और माइक लेकर पहुंचने लगे हैं। पहले फाइलों के आसपास दिखाई देते थे, अब मंच पर दिखाई देते हैं!”
मैंने माथा पकड़ लिया।
चपरासी बोला—
“साहब, दोस्ती हो तो ऐसी! शोले के जय-वीरू की जोड़ी भी हमारे मुनीश बाबू और उनके अजीज मित्र के आगे पानी भरती नजर आएगी।”
मैंने पूछा—“इतनी खास दोस्ती?”
चपरासी बोला—
“मित्र पालिका के सरताज क्या बने… मुनीश बाबू ने तो दोस्ती को ही अपना नया मंत्रालय बना लिया!”
अब शहर में चर्चा यह भी है कि बोर्ड की बैठक में आमजन और पत्रकारों की एंट्री पर पहरे हो सकते हैं, लेकिन मुनीश बाबू के लिए जैसे रास्ते में कोई ‘नो एंट्री’ का बोर्ड लगा ही नहीं!
मैंने कहा—“लेकिन मुनीश बाबू हैं कौन?”
चपरासी बोला—
“यही तो साहब… यही तो इस कहानी का सबसे बड़ा सवाल है!”
न पार्षद…
न पालिका प्रतिनिधि…
न कोई निर्वाचित पद…और न पालिका में स्थायी बाबू…
फिर भी कद ऐसा कि कई निर्वाचित जनप्रतिनिधि अपनी बारी का इंतजार करते नजर आएं और मुनीश बाबू हर गेंद पर चौका ठोकते नजर आएं!
और कल का किस्सा तो पूछिए ही मत।
पालिका के सरताज अचानक शहर से बाहर चले गए। कार्यक्रम में पहुंचना संभव नहीं हुआ।
लेकिन मुनीश बाबू ने सोचा होगा—
“सरताज नहीं पहुंच पाए तो क्या हुआ… दोस्ती का झंडा झुकने नहीं देंगे!”
बस फिर क्या था…
मुनीश बाबू कार्यक्रम में पहुंच गए।
माला पहन ली… साफा बंधवा लिया… माइक हाथ में ले लिया… और चेहरे पर ऐसी विनम्रता लाई गई, जैसे पूरी पालिका की जिम्मेदारी अभी-अभी इनके कंधों पर रख दी गई हो!
माइक से आवाज आई—
“बड़ा खेद है कि पालिका के सरताज आज कार्यक्रम में नहीं आ सके… लेकिन चिंता मत कीजिए, जनता की समस्या मेरी समस्या है!”
चपरासी ने मेरी तरफ देखा और बोला—
“साहब, ये हुई न दोस्ती! दोस्त नहीं आया तो दोस्त का प्रतिनिधि पहुंच गया!”
मैंने कहा—“लेकिन कार्यक्रम तो दुरंगी पार्टी के बागी निर्दलीय पार्षद के वार्ड में था?”
चपरासी बोला—
“हां साहब… तारीफ पार्षद जी की जितनी होनी चाहिए थी, उतनी तो नहीं हुई… लेकिन उनके देवर जी की तारीफों में कोई कसर नहीं छोड़ी गई!”
अब इसे क्या कहें?
राजनीति का नया गणित?
या दोस्ती का नया पाठ्यक्रम?
और मुनीश बाबू की जुबान…
अरे साहब, उनकी जुबान तो ऐसी है कि फिसलने के लिए भी शायद पहले अनुमति मांगती होगी!
इधर किसी प्रदेशाध्यक्ष की जुबान फिसल जाए तो पत्रकार मुद्दा बना देते हैं…
उधर मुनीश बाबू की जुबान है कि माइक पकड़ते ही तारीफों की सीढ़ी चढ़ने लगती है!
अब जनता भी सोच रही है—
“भाई, अगर मुनीश बाबू न पार्षद हैं, न पालिका के प्रतिनिधि… और न पालिका में बाबू….तो फिर आखिर ऐसी कौन सी अदृश्य कुर्सी है, जिस पर बैठकर इनका कद इतना ऊंचा हो गया?”
चपरासी ने मुस्कुराकर कहा—
“साहब, कुर्सी दिखाई नहीं देती… लेकिन दोस्ती बहुत मजबूत दिखाई देती है!”
मैंने पूछा—“और पालिका के फैसले?”
चपरासी बोला—
“साहब, फैसले किसके इशारे पर चलते हैं, ये तो जिम्मेदार लोग ही बताएंगे… हम तो बस इतना जानते हैं कि मुनीश बाबू की एंट्री हर कहानी में हो रही है!”
फिर चपरासी ने जाते-जाते कहा—
“साहब… अभी तो माला-साफा और माइक वाला ट्रेलर है। असली पिक्चर तो तब शुरू होगी, जब मुनीश बाबू दोस्ती की बाइक पर बैठकर पालिका की राजनीति के अगले मोड़ पर पहुंचेंगे!”
मैंने कहा—
“तो क्या जय-वीरू वाली दोस्ती यहीं खत्म?”
चपरासी हंसते हुए बोला—
“अरे साहब… ये दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे!”
और हां…
पिक्चर अभी बाकी है मेरे दोस्त…


