राम-सीता को मंच नही, रावण पर पालिका मेहरबान !

वाह जी वाह… रावण जी! सदियां गुजर गई, श्रीराम का रामराज्य आदर्श बन गया…
लेकिन पालिका में आपका रुतबा आज भी ऐसा है कि रामलीला भले ही गायब हो जाए, आपका इंतजाम गायब नहीं होता!
इस बार रामलीला नहीं हुई… न श्रीराम मंच पर आए, न माता सीता का त्याग दिखा, न लक्ष्मण की निष्ठा, न शत्रुघ्न का भ्राता प्रेम… लेकिन रावण जी की हाजरी पक्की रही !
शहर में गंदगी हो, गलियां अंधेरे में हों, जनता सफाई और रोशनी के लिए सवाल करती रहे-
पालिका की चिंता एकदम स्पष्ट है- रावण जी के स्वागत में कोई कमी नहीं होनी चाहिए !
पटाखे -₹1.50 लाख ! पुतला – ₹4 लाख ! मैदान सजावट – ₹2 लाख ! जुलूस-₹5 लाख ! और पूर्व संध्या का सांस्कृतिक कार्यक्रम – ₹5 लाख ! कुल मिलाकर
करीब ₹17.50 लाख ! वाह रे रावण जी… आपके अच्छे दिन तो पालिका में आज भी चल रहे हैं!
रामलीला के लिए मंच नहीं, लेकिन रावण के लिए लाखों का तामझाम !
अब जनता पूछ रही है-
रामलीला का बजट नहीं मिला या राम ही पालिका की प्राथमिकता से बाहर हो गए?
क्योंकि बात सिर्फ रावण का पुतला जलाने की नहीं है… पुतला तो हर साल जल जाता है,
लेकिन सवाल यह है कि व्यवस्था में बची रावण वाली प्राथमिकताएं कब जलेंगी?
और साहब – जय श्रीराम कहने से रामराज्य नहीं आता…
राम के आदर्शों को व्यवस्था में उतारना पड़ता है।
जनता को दशानन महोत्सव से ज्यादा रामराज्य जैसी व्यवस्था चाहिए- जहां सफाई के लिए शिकायत न करनी पड़े, रोशनी के लिए इंतजार न करना पड़े और
विकास के लिए बार-बार सवाल न पूछना पड़े।
रावण हर साल जलता है… लेकिन पालिका में रावण जी का “रुतबा” अभी भी कम होने का नाम नहीं ले रहा ! (संपादकीय व्यंग्य लेख)


